शिमला।अपने अनोखे प्रशासनिक फैसलों से पूरे देश में सनसनी पैदा करने वाले देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी के मुख्‍यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्‍खू ने प्रदेश सरकार के सबसे बड़े प्रशासनिक ओहदे पर एक बार फिर से अजीब नियुक्ति की है। सुक्‍खू ने अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव के के पंत को नियमित मुख्‍य सचिव न बना कर उनको मुख्‍य सचिव का अतिरिक्‍त कार्यभार दिया है।

 

 

के के पंत 1993 बैच के हिमाचल काडर के आइएएस अधिकारी है।वो सेवानिवृत भी 2030 में होंगे।ऐसे में उनको नियमित चीफ सेक्रेटरी क्‍यों नियुक्‍त नहीं किया गया इसका जवाब नहीं मिल रहा है।

 

इससे पहले सुक्‍खू ने 1988 बैच के आइएएस अधिकारी संजय गुप्‍ता को महज पांच दिन के लिए नियमित मुख्‍य सचिव बनाया था। उनके पास भी अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव का प्रभार महीनों तक रहा। संजय गुप्‍ता को सेवानिवृति के आखिर के सप्‍ताह में नियमित मुख्‍य सचिव बनाया। गुप्‍ता 30 मई को सेवानिवृत हो गए थे। उनके सेवा विस्‍तार की अटकलें भी चली थी लेकिन वामपंथी पार्टी माकपा ने चैस्‍टर हिल मामले में गुप्‍ता का नाम उभरने से उनका विरोध किया था।

याद रहे  चीफ सेक्रेटरी व डीजीपी को लेकर एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्‍य सरकारों से जवाब तलब किया है कि उनके राज्‍यों में नियमित मुख्‍य सचिव व डीजीपी क्‍यों नहीं है। बावजूद इसके सुक्‍खू का अपना ही कानून चलता है।

पिछली बार तो सुक्‍खू ने तीन चार दिनों तक मुख्‍य सचिव के पद पर किसी की तैनाती ही नहीं की थी। ये अपने आप में आश्‍चर्यजनक था।

अब मुख्‍य सचिव का प्रभार के के पंत को दे दिया है । वो इस समय प्रदेश नौकरशाही में सबसे वरिष्‍ठ अधिकारी है। कायदे से तो उनको नियमित मुख्‍य सचिव बना देना चाहिए था। लेकिन सुक्‍खू ने ऐसा नहीं किया। प्रशासनिक हलको में सुक्‍खू के इन फैसलों को हास्‍यस्‍पद करार दिया जा रहा है।

चीफ सेक्रेटरी ही नहीं प्रदेश में डीजीपी भी नियमित नहीं है। वरिष्‍ठ अधिकारी अशोक तिवारी को डीजीपी कर अतिरिक्‍त प्रभार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को लेकर राज्‍य सरकारों को निर्देश दिए हुए हैं कि इन पदों पर नियमित नियुक्तियां होनी चाहिए और एक कार्यकाल की अवधि को भी निर्धारित किया गया है। लेकिन सुक्‍खू सल्‍लतनत में शासन चलाने की अपनी ही नीति व नियत है।

इससे पहले सुक्‍खू ने पूर्व मुख्‍य सचिव प्रबोध सक्‍सेना को छह महीने का सेवा विस्‍तार देकर सबको चौंका दिया था वो भी तक जब सक्‍सेना के खिलाफ हाईकोर्ट में मामला चल रहा था। छह महीने के सेवा विस्‍तार के बाद सक्‍सेना को सेवा विस्‍तार तो नहीं दिया लेकिन उनको बिजली बोर्ड का अध्‍यक्ष बना दिया गया ।

इन्‍हीं करतूतों की वजह से नगर निगमों और पंचायत निकाय चुनावों में प्रदेश की जनता ने सुक्‍खू को आईना दिखा दिया है।