शिमला।पहली बार मुख्‍यमंत्री बने सुखविंदर सिंह सुक्‍खू अपनी ताजपोशी के बाद से ही अफसरों की  ट्रांसफर व पोस्टिंग को लेकर एक से बढ़कर एक Blundersकरते आए हैं।उन्‍हें अफसरों की पोस्टिंग की अहमियत का तीन साल सत्‍ता में रहने के बाद अभी भी भान नहीं हो पाया है।इसकी ताजा मिसाल शिमला के एसपी रहे संजीव गांधी को मिल्‍कफेड का प्रबंध निदेशक लगाने के रूप में सामने आई है।

संजीव गांधी पदोन्‍नत होकर डीआइजी बन गए है। पदोन्‍नति पर उन्‍हें कायदे से डीआइजी क्राइम या नारकोटिक्‍स में भेजना चाहिए था ताकि वो वहां पर अपने अनुभवों का फायदा राज्‍य के लिए दे सके। लेकिन सुक्‍खू  यहां ब्‍लंडर कर गए।

बेशक संजीव गांधी की पुलिस के कई आला अफसरों से छतीस का आंकड़ा हैं लेकिन वो एक अच्‍छे इंवेस्टिेगेटर तो है ही इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं है। गांधी ज्‍यादा किसी के दबाव में भी आते नहीं है। पूर्व डीजीपी संजय कुंडू के मामले में उनका स्‍टैंड किस तरह का रहा था ये सबको मालूम है। दूसरे डीजीपी अतुल वर्मा के मामले में भी उनका स्‍टैंड सुर्खियों में  रहा था। ये दीगर है कि सुक्‍खू उनके कामों को राजनीतिक और प्रशासनिक स्‍तर भुना नहीं पाए। इसके अलावा उन्‍हें प्रदेश व सुक्‍खू की राजनीति की भी पूरी समझ हैं।

मौजूदा समय में जिस तरह की चुनौतियां सुक्‍खू के सामने हैं वहां पर सही अफसरों की जरूरत सबसे ज्‍यादा है। संजीव गांधी को पुलिस के कामकाज का अनुभव है। इसके अलावा कानून की भी समझ है। इस अनुभव का फायदा मिल्‍कफेड में उनके किसी काम नहीं आएगा।

संजीव गांधी अर्की से विधायक संजय अवस्‍थी के करीबी है,जो सुक्‍खू के बेहद करीबी विधायकों में से एक है।

संजीव गांधी से पहले सुक्‍खू ,मौजूदा समय में सबसे वरिष्‍ठ आइपीएस अधिकारी श्‍याम भगत नेगी की पोस्टिंग को लेकर भी इसी तरह की Blunder कर चुके है। नेगी को दिल्‍ली में मोदी सरकार में बेहतर पोस्टिंग मिली हुई थी।समझा जाता है कि उन्‍हें दिल्‍ली से हिमाचल प्रदेश का डीजीपी बनाने के लिए बुलाया गया था। लेकिन नेगी के यहां आने पर उन्‍हें कम से कम दो महीने तक को पोस्टिंग ही नहीं दी गई। जब मीडिया में हल्‍ला मचा तो नेगी को सामाजिक न्‍याय व अधिकारिता विभाग का अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव लगा दिया।

प्रशासनिक स्‍तर पर ये सुक्‍खू का सही फैसला नहीं है। नेगी के पास पुलिस विभाग के कामकाज का अनुभव हैं। अगर उन्‍हें पुलिस महकमे से सरकार में कहीं लगाना ही था तो उन्‍हें अतिरिक्‍त मुख्‍य सचिव गृह लगाया जाता । लेकिन सुक्‍खू ऐसा नहीं कर कर पाए और डीजीपी का अतिरिक्‍त कार्यभार डीजीपी विजीलेंस अशोक तिवारी के हवाले कर दिया। अब जिस प्रदेश के मुख्‍य सचिव और डीजीपी  अतिरिक्‍त कार्यभार देख रहे हो, उस राज्‍य में प्रशासन पंगु तो रहेगा ही।

 

किस अफसर को कहां लगाना है ये सबक सुक्‍खू को वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूल से सीखना चाहिए था। धूमल जब पहली बार मुख्‍यमंत्री बने थे तो उनके साथ थी ऐसा ही हुआ था लेकिन जब वो दूसरी बार मुख्‍यमंत्री बने तो उनने अरुण शर्मा के अलावा आइर्एएस आर एस गुप्‍ता को अपने साथ रखा और वो-वो जटिल काम कर गए जो बेहद मुश्किल थे।

आईपीएस एसबीएन और संजीव गांधी के अलावा सुक्‍खू ने कई एचएएस और आईएएस अधिकारियों को नाराज किया हुआ है।ओंकार शर्मा को वो संभाल नहीं पाए। उनने विमल नेगी मामले में खतरनाक रपट सरकार को दे दी। अर्की में एक अफसर थे, उनने संजय अवस्‍थी का कोई काम नहीं सुना तो उनको अब तक लाहुल स्पिति ,चंबा से लेकर कांगड़ा में घुमाया जा रहा है। इसी तरह कुल्‍लू के एक अफसर को भी इसी तरह जगह-जगह पोस्टिंग दी जा रही है।शायद उनका भुवनेश्‍वर गौड़ से सामंजस्‍य नहीं बैठ पाया।

2010 बैच के आइएएस सुदेश कुमार मोख्‍टा को शायद बिना काम के ही रखा गया है। जबकि वो भी काम करने वाले अफसर माने जाते है। ये दीगर है कि काम करने वाले अफसरों से गलत काम कराना इतना सहज नहीं होता ।

 

सुक्‍खू शुरू से ही पूर्व मुख्‍य सचिव प्रबोध सक्‍सेना,राम सुभग सिंह और देवेश कुमार के ही घेरे में रहे। लेकिन सरकार को लेकर कोई अच्‍छे परिणाम सामने नहीं हैं।खासकर 16वें वितायोग की सिफारिशें जिस तरह से सामने आई है उससे साफ है कि सुक्‍खू की नौकरशाही पूरी तरह से फेल रही है और सुक्‍खू अभी भी जिनकी धून पर नाच रहे है वो उनके किसी काम आने वाली लग नहीं रही है।

सुक्‍खू के पास अभी भी मौका है कि वो अपने प्रशासनिक ढांचे में सही फेरबदल करे तो कुछ उम्‍मीद की जा सकती है।कम से कम वित सचिव देवेश कुमार को तो वित विभाग से मुक्‍त कर ही देना चाहिए। इसके अलावा सुक्‍खू को अब राम सुभग सिंह से भी छुटकारा पा लेनाचाहिए। प्रबोध  सक्‍सेना को तो अतुल शर्मा की हाईकोर्ट में दायर याचिकाओं पर हाईकोर्ट की ओर से की गई टिप्‍पणियों को देखते हुए बिजली बोर्ड में लगाना ही नहीं चाहिए था।  लेकिन सुक्‍खू ने ये सब किया । उधर,मुख्‍य सचिव का अतिरिक्‍त कार्यभार देख रहे संजय गुप्‍ता मई में सेवानिवृत होने ही वाले है।

इन दिनों सचिवालय के गलियारों में यह भी अटकलें लगाई जा रही है इस बार बजट बनाने के लिए किसी सेवानिवृत आइएएस की मदद ली जा रही है। अब ऐसे कदम उठाएं जाएंगे तो सरकार संकट में तो रहेंगी ही।