शिमला। पाखली माणु, बुदुआ मामा और लाड़ी शावणी जैसे अनेकों लोकगीतों के जरिए धूम मचाने वाले हिमाचली लोकगायक इंद्रजीत को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान राष्ट्रीय युवा पुरस्कार-2024’ से नवाजा हैं। लोकगायक इंद्रजीत लोकगीतों के जरिए हिमाचली लोक संस्कृति को जीवंत रखने के और इस बुलंदियों पर पहुंचाने का बीड़ा उठाए […]
शिमला। पाखली माणु, बुदुआ मामा और लाड़ी शावणी जैसे अनेकों लोकगीतों के जरिए धूम मचाने वाले हिमाचली लोकगायक इंद्रजीत को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान राष्ट्रीय युवा पुरस्कार-2024’ से नवाजा हैं। लोकगायक इंद्रजीत लोकगीतों के जरिए हिमाचली लोक संस्कृति को जीवंत रखने के और इस बुलंदियों पर पहुंचाने का बीड़ा उठाए हुए है।
इंद्रजीत ने लोकगायकी की दुनिया में उस दौर में कदम रखा जब हिमाचल के गांव -खलियानों में हिमाचली मिटटी की खुशबू महकाने वाले लोकगीतों की जगह पंजाबी गीतों की चकाचौंध कब्जा कर चुकी थी। 2010 के आसपास के उस दौर में इंद्रजीत को के साए में जा चुकी थी। ऐसे में इंद्रजीत के कदम हिमाचली लोकगायकी के जरिए हिमाचल संस्कृति और कला को जीवंत बनाने की ओर बढ़े और आज 2026 में वो अपना मुकाम हासिल करने में कामयाब भी रहे है।
उन्होंने अपने लोकगीतों का फिल्मांकन इस बाखूबी से किया किया व इसमें पूरा हिमाचली परिवेश समेटने में कामयाब रहे है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने उनके योगदान को मान्यता प्रदान की और 2024 का उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान राष्ट्रीय युवा पुरस्कार उनके नाम कर दिया।
नई दिल्ली में आयोजित समारोह में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के हाथों उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। संगीत नाटक अकादमी द्वारा लोक संगीत के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए गए इस राष्ट्रीय पुरस्कार से कुल्लू सहित पूरे हिमाचल प्रदेश का गौरव बढ़ा है।
जिला कुल्लू के गाँव दोघरी से संबंध रखने वाले इन्द्र जीत पिछले कई वर्षों से हिमाचल की प्राचीन लोक संस्कृति, पारंपरिक लोकगीतों, स्थानीय बोलियों और पहाड़ी जनजीवन के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं। बिना किसी औपचारिक संगीत प्रशिक्षण के उन्होंने अपनी मेहनत, प्रतिभा और समर्पण के दम पर लोक संगीत के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई है।
समय के साथ हिमाचल के अनेक पारंपरिक लोकगीत और लोक परंपराएँ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच रही थीं। ऐसे में इन्द्र जीत ने इन लोकगीतों को नए अंदाज़ में प्रस्तुत कर उन्हें नया जीवन देने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सराहनीय प्रयास किया है। उनके गीतों में हिमाचल की मिट्टी की खुशबू, पहाड़ी जनजीवन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलती है। उनके सांस्कृतिक कार्यों ने युवाओं को अपनी भाषा, परंपराओं और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने तथा लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रेरित किया है।
अपने वीडियो गीतों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से इन्द्र जीत ने हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति को देश-विदेश में करोड़ों लोगों तक पहुँचाया है। उन्होंने अपने गीतों में कुल्लवी टोपी, शॉल, मफलर, पट्टू सहित पारंपरिक वेशभूषा और हस्तशिल्प को प्रमुखता देकर स्थानीय कारीगरों के हुनर को व्यापक पहचान दिलाने का प्रयास किया है। उनके ये प्रयास सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ पारंपरिक हस्तशिल्प को प्रोत्साहन देने और स्थानीय कारीगरों की आजीविका एवं रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देने की दिशा में भी सराहनीय हैं।
लोक संगीत के साथ-साथ इन्द्र जीत नशा मुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जागरूकता जैसे विषयों पर भी संगीत के माध्यम से सकारात्मक संदेश देते रहे हैं।
इस उपलब्धि पर इन्द्र जीत ने अपने माता-पिता नोख राम एवं लीला देवी, परिवार, शुभचिंतकों, प्रशंसकों, श्रोताओं, प्रदेश के कलाकारों और मीडिया जगत का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति और समस्त लोक कलाकारों का सम्मान है। उन्होंने यह पुरस्कार अपनी जन्मभूमि हिमाचल प्रदेश और प्रदेश की जनता को समर्पित किया।
इन्द्र जीत की यह उपलब्धि प्रदेश के कलाकारों और युवाओं के लिए प्रेरणा है। उनके प्रयास हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
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