शिमला। प्रदेश घोर आर्थिक संकट में है कर्मचारियों व पेंशनरों की अरबों रुपयों की देनदारी है।बावजूद इसके प्रदेश की कांग्रेस की सुक्‍खविंदर सरकार पर नए जिलों के गठन की सनक सवार हो गई है। सनक तो ठीक है लेकिन इसे अमली जामा पहनाने के लिए आयोग तक का गठन कर दिया है। इस आयोग के अध्‍यक्ष व सदस्‍यों पर ही अब जनता के खजाने से लाखों लूटाने का इंतजाम कर दिया है।

नए जिलों के गठन को लेकर इससे पहले पूर्व मुख्‍यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने भी सियासी बवंडर खड़ा करने की कोशिश की थी। तब उन्‍हें प्रदेश की आर्थिकी की तस्‍वीर समझा कर इस राजनीतिक मखौल करने से बचा लिया गया था। लेकिन पहली बार मुख्‍यमंत्री बने सुक्‍खविंदर सिंह सुक्‍खू पिछले चार सालों में एक से बढ़ कर एक राजनीतिक व संवैधानिक मखौल करते आ रहे है। और ये सब वो जतना के खजाने के दम पर करते आ रहे है। दुखद ये है कि उनको कोई समझाने वाला नहीं है। नौकरशाही अपने स्‍तर पर मौज कर रही है । बाकी जो उनके संगी-साथी नेता है वो तमाम सुक्‍खू की तरह ही है जो जमीनी हकीकतों से बावस्‍ता होने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में सुक्‍खू सियासी मखौल करने वाले मुख्‍यमंत्री उभरते जा रहे है। मजे की बात ये है कि वो इस बीच मिशन रिपीट करने का सपना भी देख रहे है।

सियासी मखौल इसलिए कि पंच पीढ़ी की इंटरनेट स्‍पीड की दौर में जब कहीं भी वीडियों कांफ्रेंसिंग के जरिए संपर्क करना बाएं हाथ का खेल हो। आप जब गहरी नींद में सपने देख रहें होते हैं तब वाटसएप संदेशों की भरमार सिरहाने रखे मोबाइल में लग चुकी होती है। सपनों में भी आपातकाल में ड्रोनों की तकनीक ने सड़कों की जरूरतों को कम कर दिया हो और संपर्क कटना जब नामूमकिन हो तो ऐसे में नए जिलों के गठन का शिगूफा छेड़ देना सियासी मखौल नहीं तो और क्‍या है। धूमल के अलावा बाकी मुख्‍यमंत्रियों के शासनकाल में भी नए जिलों के गठन को हवा दी जाती रही थी। सत में पांच साल तक रहने के बाद विफल रहने वाले नेताओं को लगता था कि वो नए जिलों के गठन को चुनावी मुददा बनाकर कुछ सीटें जीत लेंगे। लेकिन जो मजबूत नेता होते हैं वो औचित्‍यहीन मुददों के दम पर चुनाव नहीं जीता करते। लेकिन सुक्‍खू व उनके दौर के नेता चाहे वो किसी भी दल में हो एक सी ही कद काठी के है।आए दिन शिगूफे छोड़ते रहते है।

नए जिलों के गठन से आखिर जनता को क्‍या लाभ होगा। कुछ-कुछ आवाजें इस तरह से बुलंद किए जाने की कोशिशें की जा रही है कि फलां इलाका जिला मुख्‍यालय से इतना किलोमीटर दूर है। इंटरनेट की जमाने में ये तर्क ही बेमानी है। इसके अलावा मुख्‍यमंत्री के पास तो उड़नखटोला है ही उन्‍हें जब जहां उड़ना होता है वो उड़ ही जाते है। इंटरनेट के जमाने में अब दूरियों की बात करना बेवकूफी भरी बातें करने से ज्‍यादा कुछ नहीं है। अब तो फाइलें भी आनलाइन ही डील होती है। ऐसे में दूरियों की दलीलें बचकाना साबित हो चुकी है।

पिछले चार सालों में सुक्‍खू सरकार की विफलताओं की फेहरिस्‍त छोटा होने का नाम नहीं ले रही है। कभी वाटर सेस लगाने का शिगूफा छेड़ा गया तो कभी कुछ पावर प्रोजेक्‍टस को टेकओवर करने की कोशिशें की जाती रही। बड़ा मखौल तो सुक्‍खू ने तब कर दिया जब उनने केंद्र सरकार के चंबा स्थित एक बिजली प्रोजेक्‍ट को टेकओवर करने की मुहिम छेड़ दी। वाटर सेस वसूलने की मुहिम को अदालत अवैध ठहरा दिया। पावर प्रोजेक्‍टस को टेकओवर करने के मामले अदालत में लंबित है। सुक्‍खू हिमाचल भवन को कुर्क होने क अदालत के आदेश को शायद ही भूले हों। उनका तब देश भर में खूब मखौल उड़ाया गया। रही सही कसर ने रेरा के अध्‍यक्ष की नियुक्ति के दौरान जो सरकार की फजीहत हुई उसने पूरी कर दी। इसके अलावा भी बहुत कुछ है।अब सरकार पर नए जिलों के गठन को लेकर नई सनक खड़ी हो गई और वो भी तक जब सुक्‍खू सरकार के सत्‍ता में रहने के केवल 11 महीने बचे है।

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