शिमला। अदाणी पावर की ओर से 280 करोड़ रुपए अपफ्रंट मनी लौटाने के लिए प्रदेश हाईकोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई के मौके पर महाधिवक्ता अशेक शर्मा की ओर से खंडपीठ के सामने दी इस स्टेटमेंट पर कि सरकार इस मामले को पुनर्विचार के लिए मंत्रिमंडल में ले जाएगी,देने को किसने निर्देश दिए पर सवाल खड़ा हो गया।
प्रधान सचिव पावर प्रबोध सक्सेना ने इस मसले पर मुख्यमंत्री व ऊर्जा मंत्री जयराम ठाकुर है कि विभाग के स्तर पर महाधिवक्ता को अदालत में इस तरह का वक्तव्य देने के कोई निर्देश नहीं दिए गए थे। क्या ऊर्जा मंत्री के स्तर पर इस तरह के निर्देश महाधिवक्ता को दिए गए है। अगर ऐसा है तो वह विभाग को बताएं कि अब सचिव व विभाग को आगे क्या करना है। अनिल शर्मा की ओर से ऊर्जा मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद जयराम ठाकुर ऊर्जा मंत्री भी है।
याद रहे अदाणी पावर की ओर से 2008 से 18 फीसद ब्याज के साथ 280 करोड़ रुपए अपफ्रंट मनी के लौटाने को लेकर दायर याचिका पर 26 अप्रैल को प्रदेश हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई हुई थी। पीठ की ओर से सुनाए गए आदेश में लिखा गया है कि महाधिवक्ता ने जवाब दायर करने के लिए और समय मांगा ताकि इस मामले पर मंत्रिमंडल में पुनर्विचार किया जाए और उपयुक्त फैसला लिया जा सके। इस उददेश्य के लिए आचार संहिता के समाप्ति के एकदम बाद मामले को मंत्रिमंडल के सामने ले जाया जाएगा। आदेश में कहा गया है कि महाधिवक्ता ने निर्देशों का हवाला दिया है।
इस पर पीठ ने आदेश में कहा कि 20 जून को अगली सुनवाई होगी ताकि इस बीच ऊपर दिए गए महाधिवक्ता के वक्तव्य के आधार पर कानून के मुताबिक उपयुक्त फैसला लेने के लिए मंत्रिमंडल की ओर से पुनर्विचार किया जा सके। बेशक इस बावत सरकार ने पहले कोई फैसला कर लिया हो ।
इस आदेश के आने के बाद सचिवालय में हड़कंप मचा हुआ है। सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा हो गया है कि अगर प्रधान सचिव पावर व निदेशक ऊर्जा ने महाधिवक्ता को ये आदेश नहीं दिए तो फिर एजी को ये आदेश किसने दिए। क्या कहीं से मौखिक आदेश हुए है या पीठ के स्तर पर ही कोई गलतफहमी हो गई है। चूंकि मामला देश के शीर्ष उद्योगपति गौतम अदाणी समूह की कंपनी से जुड़ा हुआ है। ऐसे में तरह-तरह के संदेह व सवाल खड़े हो गए है।
याद रहे कानून के मुताबिक इस रकम को लौटाया नहीं जा सकता है। क्योंकि इस रकम को अदाणी पावर ने ब्रेकल की ओर से जमा कराया था। उसे यह रकम ब्रेकल से लेनी है। इस बावत सरकार सुप्रीम कोर्ट में भी यह दलील दे चुकी है।
पिछल्ली वीरभद्र सिंह सरकार में 2015 में मंत्रिमंडल ने इस रकम को लौटाने का फैसला जरूर लिया था लेकिन वह लौटा नहीं पाई थी। आखिर में दिसंबर 2017 में कानूनी जटिलताओं और जिस कंपनी ब्रेकल कारपोरेशन एनवी को 2006 में तत्कालीन वीरभद्र सिंह सरकार ने 960 मेगावाट का जंगी थोपन पावर प्रोजेक्ट आवंटित किया था के नियमों का हवाला देकर इस रकम को लौटाने का फैसला वापस ले लिया था।
मुख्यमंत्री को फाइल पुटअप की है
प्रधान सचिव पावर प्रबोध सक्सेना ने कहा कि महाधिवक्ता को अदालत में इस तरह की स्टेटमेंट देने के लिए किसने निर्देश दिए है यह कंफर्म करने के लिए ऊर्जा मंत्री को फाइल पुटअप की है। यह पूछे जाने पर की कि क्या उनके स्तर पर यह निर्देश नहीं दिए गए है और क्या किसी और प्रक्रिया से भी ये निर्देश दिए जा सकते है। सकसेना ने कहा कि उन्होंने इस तरह के कोई भी निर्देश महाधिवक्ता को नहीं दिए है। उनके ऊपर भी तो लोग है। उन्होंने कहा कि हो सकता है ऊर्जा मंत्री ने दिए हो । यह कन्फर्म करने के लिए फाइल पुट अप की। क्या कोई जवाब आया। उन्होंने कहा कि सब लोग चुनाव में है, किसी के पास समय कहां है और मंत्रिमंडल की बैठक आचार संहिता के बाद होनी है । ऐसे में जल्दी भी नहीं है। क्या इस मामले पर पुनर्विचार की जरूरत है, इस बावत सक्सेना ने कहा कि कोई जरूरत नहीं है। यह पूछे जाने पर कि प्र्िरक्रया के मुताबिक क्या ऊर्जा मंत्री के स्तर पर सीधे महाधिवक्ता को निर्देश दिए जा सकते है या सचिव के जरिए ही फाइल आगे बढ़ सकती है। सक्सेना ने कहा कि दोनों स्तर पर चीजें हो सकती है।
बहरहाल, इस मसले पर प्रधान सचिव की ओर से मुख्यमंत्री / ऊर्जा मंत्री को लिखी चिटठी ने जयराम सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े कर दिए है। कौन कहां से क्या कर रहा है किसी को कोई पता नहीं है। इससे पहले वीरभद्र सिंह व धूमल सरकार भी इस मामले में कटघरे में खड़ी हो चुकी है।
याद रहे 2006 में तत्कालीन वीरभद्र सिंह सरकार ने 960 मेगावाट के जंगी थोपन पावर प्रोजेक्ट को नीदरलैंड की कंपनी ब्रेकल कारपोरेशन एनवी को आवंटित किया था। लेकिन यह कंपनी जब अपफ्रंट मनी नहीं लौटा पाई तो बोली में दूसरे स्थान पर रही कंपनी रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने अदालत में याचिका दायर कर दी। बाद में ब्रेकल की ओर से अदाणी पावर ने अपफ्रंट मनी के 260 करोड़ रुपए व देरी से अफ्रंट जमा कराने के तौर पर लगे जुर्माने के 20 करोड़ जमा कराए थे। लेकिन ब्रेकल के खिलाफ कई कुछ सामने आने पर दिसंबर 2007 के बाद सता में आई धूमल सरकार ने भी इस आवंटन को रदद नहीं किया था। लेकिन रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की याचिका पर 7 अक्तूबर 2009 को प्रदेश हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायामूर्ति दीपक गुप्ता और वी के आहुजा की खंडपीठ ने इस आवंटन को रदद कर दिया था।
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