शिमला। पिछले दिनों केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री बनने के बाद पहली बार अपने गृह प्रदेश पहुंचे अनुराग ठाकुर अपनी पांच दिन तक चली जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान भाजपा के अब तक हाशिए पर धकेले गए खेमे को प्रदेश में होने वाले उपचुनावें से पहले सक्रिय कर गए है।
साथ ही अनुराग ने प्रदेश के कला और संस्कृति के अलावा खेलों में हिमाचल का नाम ऊंचा कराने की दिशा में कुछ उम्मीदें जगाई जरूर है लेकिन यह इतना आसान नहीं है। बेशक उनके पास सूचना व प्रसारण जैसा मंत्रालय है जिसके जरिए वह हिमाचल के कलाकारों को देश दुनिया में पहुंचा सकते है। लेकिन उससे पहले इन कलाकारों की कला को मांजने का काम प्रदेश स्तर पर करने की जरूरत है। यह काम बिना सरकार के सहयोग के बिना नहीं हो सकता। कलाएं हमेशा किसी न किसी आश्रय में पनपती और बुलंदियों को छूती है।
दुनिया भर के देशों में कला व संस्कृति के स्तर पर तरह- तरह के आंदोलन चल रहे है लेकिन हिमाचल व भारत की आंचलिक कलाएं उनसे अछूती रह गई है।जब तक आदान -प्रदान व शिक्षण -प्रशिक्षण नहीं होगा यह काम आसान नहीं होगा।इस तरह लोक गीतों व लोक कलाओंं को भी दुनिया से रूबरू कराने का वह भरोसा दे गए हैं। पहले रेडियो ने अनगिनत लोक कलाकारों की जनता के बीच पहचान बनाई थी। अब तो दूरदर्शन भी है। लेकिन दोनों ही जगहों पर बर्बादी का मंजर तारी है। भ्रष्टाचार के कृत्यों ने इन दोनों की संस्थानों को तबाह कर दिया है। सीबीआइ मामले चल रहे है और मोदी सरकार के आला अफसर अभियोजन की मंजूरियों पर कुंडली मार कर बैठे हैं। कुछ सेवानिवृत हो गए उनके खिलाफ महिलाओं के साथ कृत्य करने के मामले अदालतों में पहुंच गए हैं। प्रतिभाओं को पीछे धकेल दिया है जबकि इन मंचों पर खड़े होने के प्रतिमान अब कुछ और ही हो गए हैं। अनुराग ठाकुर पता नहीं इस दिशा में कुछ कर पाएंगे या नहीं । भ्रष्टाचार के दलदल में प्रतिभाएं कभी भी पनप नहीं सकती हैं।
इसके अलावा उन्होंने प्रदेश में खेलों के लिए कुछ करने को लेकर भी उम्मीदें जगाई है। यह ठीक है कि उन्होंने धर्मशाला में क्रिकेट स्टेडियम बना दिया लेकिन उसके पीछे प्रदेश की तत्कालीन धूमल सरकार का बहुत बउ़ा हाथ रहा है। हालांकि वह इसका श्रेय खुद बटोर ले जाते है। लेकिन प्रदेश की जानती तो जानती है कि क्रिकेट स्टेडियम कैसे बना था। इसके अलावा अुनराग को पूर्व केद्रीय मंत्री अरुण जेटली का हमेशा साथ मिलता रहा। बदली स्थितियों में अनुराग को यह सब करने के लिए मनमाफिक राजनीतिक सता चाहिए होगी। बड़ा सवाल यही है कि क्या वह राजनीतिक सता हासिल कर पाएंगे। केंद्र में अभी उनकों गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साथ मिल रहा है। इसकी अलग -अलग वजहें है। अनुराग के पास जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है अपना जनाधार खड़ा करना । राजनीति में लंबे समय तक वही आगे बढ़ते रहे हैं जिनके पास जनाधार रहा है और जनाधार वही हासिल कर पाते है जो जनता की नब्ज जानने में माहिर होते है। अनुराग अभी आलाकमान की नब्ज पहचान पा रहे है।
अपनी जनआशीर्वाद यात्रा के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और उनके खेमे ने 630 किलोमीटर चली इस यात्रा के दौरान जगह-जगह पर अनुराग के स्वागत में खूब भीड़ जुटाई और प्रदेश में यह एहसास करा दिया कि धूमल का जलवा अभी भी प्रदेश में बरकरार है। भाजपा प्रभारी अविनाश राय खन्ना और सह प्रभारी संजय टंडन ने भी खूब जोर लगाया। केंद्र सरकार के निर्देशों पर आयोजित इस यात्रा के जरिए आलाकमान ने प्रदेश में आगामी चार उपचुनावों से पहले जनता की नब्ज जांचने का काम भी कर लिया।
अनुराग ठाकुर बेशक केंद्रीय मंत्री बन गए हो लेकिन अभी उनका जनता के साथ उस तरह का लगाव नहीं है जिस तरह का लगाव उनके पिता व पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का जनता के साथ है। इस जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान वह अपने भाषणों से जनता को अपनी ओर ज्यादा खींच नहीं पाए हैं। जो भीड़ जुटी भी उनमें अधिकांशतया धूमल समर्थक थे व धूमल की ही वजह से थे। यह अनुराग भी इन पांच दिनों में समझ चुके है।
अनुराग को अभी अपनी अलग पहचान बनाने में समय लगेगा व यह तभी संभव हो पाएगी जब वह ज्यादा से ज्यादा जनता के बीच जाएंगे । अगर अनुराग प्रदेश की कला व संस्कृति से जुड़े लोगों को सच में देश दुनिया में पहचान दिला पाने में कामयाब हो पाए तो जमीन पर उनका अपना जनाधार भी बनेगा व एक नई पहचान बनाने में कामयाब हो पाएंगे।
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