शिमला।सुक्खू राज में सिराज के Blind Couple को बीपीएल की सूची से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इस परिवार की आय 68 हजार सालाना सामने आई। सिराज के बरौएगी ग्राम पंचायत के दयावंत सेन और रामपुर की सुरेखा ठाकुर पिछले साल यानी नवंबर 2024 में ही शादी के बंधन में बंधे थे। दोनों की मुलाकात राजधानी में धरने के दौरान हुई और शादी का फैसला कर लिया।सुरेखा ठाकुर भी Blind हैं। रामपुर में सुरेखा ठाकुर,उसका भाई और बहन ये तीनों अचानक Blind हो गए थे।
दयावंत के परिवार में उसके बूढ़े माता-पिता है जो किसी तरह गुजर बसर करते है।लेकिन इस बार मंत्री अनिरुद्ध सिंह के पंचायती राज विभाग ने बीपीएल को लेकर नए दिशा निर्देश जारी कर दिए जिसमें में ये शर्त रख दी कि जिस परिवार की आय 50 हजार रुपए सालाना से ज्यादा है उसे बीपीएल में शामिल नहीं किया जाएगा।
सुरेखा ठाकुर को जो आय का प्रमाणपत्र दिया गया है उसमें इस परिवार की सालाना आया 53 हजार रुपए दर्शाई गई है जबकि दयावंत के पिता मेहरचंद को दिए आय प्रमाणपत्र में ये आय 68 हजार दर्शाई गई है।
मेहरचंद के नाम सात आठ बीघा जमीन है। उसी के आधार पर ये आय दर्शाई गई है।
ऐसे में ये परिवार गरीबों को सहारा देने वाली बीपीएल योजना से बाहर हो गया। पहले Blind लोगों को बिना शर्त बीपीएल में शामिल करने का प्रावधान था लेकिन अब सुक्खू राज ने इन प्रावधानों को बदल दिया है।
हालांकि बरौउगी पंचायत की प्रधान जयवंती भी मानती है कि इस परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं हैं। खेतों में Blind लोग क्या ही कर लेंगे। कोई सरकारी नौकरी तो है नहीं लेकिन सरकार की शर्तें ही ऐसी है तो क्या कर सकते है। उधर, बीडीओ कार्यालय से कहा गया कि दयावंत के पिता को अपील की सलाह दी गई है।
थुनाग के एसडीएम रमेश कुमार कहते है कि अगर आय का प्रमाण पत्र में 68 हजार रुपए की आय दर्शा दी गई है तो वो भी ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। साफ है कि डीसी के पास भी कुछ ज्यादा करने को नहीं है।
उधर, नए दिशा निर्देशों के मुताबिक अगर दयावंत अपने बूढ़े माता-पिता से अलग भी हो जाता है तो भी कम से कम तीन साल बाद वो बीपीएल में आ सकेगा।
दूसरी ओर धरने में पुलिस कार्रवाई के दौरान दयावंत की टांग फ्रैक्चर हो गई। पुलिस ने जब तक वो आइजीएमसी में दाखिल रहा तब तक उसके इजाल के लिए पैसे दिए । उसके बाद उसे जबरन घर सिराज छोड़ दिया। अब हर पंद्रह दिन दयावंत को आइजीएमसी इलाज के लिए बुलाया जाता है। ऐसे में दयावंत और पत्नी सुरेखा ठाकुर अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे दृष्टिहीनों की धरने में शामिल हो गए तब से वो अपने गांव नहीं जा सके है।
चूंकि दयावंत की टांग में फ्रैक्चर है तो वो बस में यात्रा नहीं कर सकता और टैक्सी का खर्च 9 -10 हजार से कम नहीं आएगा। दूसरी ओर आय का कोई जरिया नहीं है।
ऐसे में ये दोनों राजधानी में कालीबाड़ी के नीचे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के समीप वर्षा शालिका में डेरा डाले हुए। ऐसे में वो आंदोलन भी कर रहे है और सुरेखा अपने पति का इलाज भी कर रही है।
सुरेखा ने कहा कि यहां से आइजीएमसी जाने के लिए अगर एंबुलेंस बुलाओं को वो आते ही नहीं । साफ कह देते है कि वो कहीं दूसरे मरीज को लाने गए है। एक बार पूरा दिन इंतजार करते रहे है। अब निजी एंबुलजेंस को बुलाते है वो तीन सौ रुपए आइजीएमसी जाने का और तीन सौ रुपए वापस स्टेट बैंक तक आने का किराया लेते है। इस पर आलम ये है कि वो बिल भी नहीं देते। अगर बिल मिल जाए तो वो रेडक्रॉस में बिल जमा करा कर उसकी वसूली करा सकते है।
दयावंत कहते है कि आईजीएमसी में हर पंद्रह दिन बाद उसे एक दिन के लिए दाखिल होना पड़ता है। इसी दिन छह सात हजार रुपए का खर्च आ जाता है। 32 -33 सौ का तो कोई इंजेक्शन ही लगता है। इसके अलावा मंहगी दवाएं अलग से हैं और जेब में कोई पैसा नहीं है।
रेडक्रॉस से बिल पास कराने भी तो जाना पड़ता है। चूंकि दोनों ही Blind है तो वो अलग मुश्किल है।
वो कहते है कि पहले Blind लोगों के लिए भी सहारा योजना के तहत तीन हजार रुपए की पेंशन मिलती थी लेकिन सुक्खू राज में ये पेंशन भी अब पिछले कई महीनों से नहीं मिली है। यानी सहारा पेंशन बंद कर दी गई है।
दयावंत और सुरेखा दोनों ने बाहरवीं तक शिक्षा हासिल कर ली है और ब्रैल से पढ़ भी लेते है।
दयावंत कहते है कि वो 2017 में भी धरने पर बैठे थे। तब उनके साथ के लोगों को नौकरी मिल गई । वो रह गए। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने रामपुर से कांग्रेस विधायक नंद लाल को उनके पास उनका अनशन खत्म कराने भेजा था। नंदलाल ने उसे भी भरोसा दिलाया कि वो उसका काम राजा साहब से कराएगा। लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ।
उसके बाद वो अक्तूबर 2023 में दोबारा से अनशन पर बैठ गए।लेकिन 27 मार्च 2025 को दृष्टिहीनों का सचिवालय के बाहर चक्का जाम था। उसके बाद वो सचिवालय के ग्राउंड में चले गए। वहां पर पुलिस ने उन पर कार्रवाई कर दी । किसी पुलिस वाले ने उनको रोकने के लिए उसकी टांग पकड़ी तो दूसरे ने छाती को धक्का दे दियस वो गिर गया और रैंलिंग से नीचे जा गिरा। उसकी टांग टूट गई। किसी भी पुलिस वाले पर एफआइआर नहीं हुई।
पुलिस ने बोला कि वो उसके इलाज का सारा खर्च उठाएंगी । वो डेढ महीना आइजीएमसी में पड़ा रहा उसकी टांग में प्लैट पड़ी ।सुरेखा याद करते हुए कहते है कि पुलिस वाले उसे बार-बार फोन करते थे वो उसे घर यानी सिराज ले जाएं अन्यथा वो जबरन उसे घर छोड़ देंगे और एक दिन वो पुलिस दयावंत को घर ले आई।
इस बीच उन्हें पंद्रह दिन बाद आइजीएमसी आए और अगस्त में सिराज में आपदा आ गई तब से लेकर वो घर नहीं जा सके है।
सुरेखा ठाकुर कहती है कि जब वो छठी कक्षा में थी तो उसकी आंखों की रोशनी कम होने लगी थी लेकिन किसी ने शुरू में ध्यान नहीं दिया। बाद में आइजीएमसी और रिपन से कहा गया कि नसें कमजोर हो गई है। अब कुछ नहीं हो सकता।
लेकिन वो कहती है कि संजौली में उसने होम्योपैथी डॉक्टर से दिखाया था। उसने दवा भी दी थी व कहा था कि एक साल तब लगातार दवा खाने के बाद आंखों की रोशन लौटने की उम्मीद है। दो महीने तक तो उसने दवा खाई भी लेकिन बाद में वो खा नहीं सकी। क्योंकि ये गोलियां छोटी होती थी व गिन कर खानी पड़ती थी वो हाथ भी नहीं लगना चाहिए था। ऐसे में जब तक मां -व भाभी मदद करती रही तब तक वो खाती रही लेकिन इसे जारी रखना मुश्किल हो गया तो उसने छोड़ दी। दवा का महीने का खर्च भी दो हजार रुपए था।
इस बावत निदेशक स्वास्थ्य डॉक्टर गोपाल बेरी से जब ये पूछा गया कि क्या इस दिशा में सरकार के स्तर पर कुछ किया जा सकता है तो उन्होंने कहा कि होम्योपैथी का मामला तो आयुर्वेद विभाग के तहत आता है। वहां से कुछ हो सकता है। उधर, आयुर्वेद विभाग से संपर्क नहीं हो पाया । इसी तरह सहारा पेंशन को लेकर भी उनने कहा कि ये मामला उनके अधीन नहीं है।
बहरहाल,व्यवस्था परिवर्तन के एजेंडे को चला रही सुक्खू सरकार ने अगर तीन साल के शासन में कुछ बड़ा किया तो वो दृष्टिहीन दयावंत की टांग तोड़ी, उसे बीपीएल से बाहर कर दिया और उनकी सहारा पेंशन बंद कर दी। इसके अलावा उनकी जिंदगी को मुश्किल करने का का हर इंतजाम ये सरकार करने में तुली है। याद रहे बीपीएल का मामला पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह के अधीन है और सहारा योजना स्वास्थ्य मंत्री धनी राम शांडिल के अधीन है जबकि टांग तोड़ने वाली पुलिस खुद सुक्खू के अधीन है।
(215)







